19_09

हिन्दु संस्कृति के वट विशाल





तेरी चोटि नभ छूती है 
तेरी जड पहुँच रही पाताल 
हिन्दु संस्कृति के वट विशाल॥धृ॥ 

जाने कितने ही सूर्योदय 
मध्यान्ह अस्त से तू खेला 
जाने कितने तूफानों को 
तूने निज जीवन में झेला 
कितनी किरणों से लिपटी है 
तेरी शाखाएँ डाल-डाल ॥१॥ 
हिन्दु संस्कृति के वट विशाल

जाने कितने प्रिय जीवों ने 
तुझमें निज नीड़ बनाया है 
जाने कितने यात्री गण ने 
आ रैन बसेरा पाया है 
कितने शरणागत पूज रहे 
तेरा उदारतम अन्तराल ॥२॥ 
हिन्दु संस्कृति के वट विशाल

कुछ दुष्टों ने जड़ भी खोदी 
शाखा तोड़ी पत्ते खींचे 
फिर कई विदेशी तत्वों के 
विष से जड़ के टुकड़े सींचे 
पर सफल आज तक नहीं हुई 
उन मूढ़ जनों की कुटिल चाल ॥३॥
हिन्दु संस्कृति के वट विशाल

अनगिन शाखाएँ बढ़ती है 
धरती में मूल पकड़ती हैं हो 
अन्तर्विष्ट समष्टि समा वे तेरा 
पोषण करती है तुझ में 
ऐसी ही मिल जाती जैसे 
सागर में सरित माल ॥४॥
हिन्दु संस्कृति के वट विशाल

उन्मुक्त हुआ लहराता है 
छाया अमृत बरसाता है 
ओ जग के प्रिय वट वृक्ष सदा 
सन्तानों को सरसाता है 
जग में सबसे ऊँचा दीखे 
श्रद्धास्पद तेरा भव्य भाल ॥५॥
हिन्दु संस्कृति के वट विशाल
तेरी चोटि नभ छूती है 
तेरी जड पहुँच रही पाताल 
हिन्दु संस्कृति के वट विशाल





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