19_09
दीन दुखी की सेवा करना
हम सेवक है मानवता के, सेवा धर्म हमारा है।
दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है ।।ध्रुव।।
जिसने सेवा धर्म निभाया, नर में नारायण देखा,
वही महामानव देखेगा, हर मानव में प्रभु रेखा,
एक ब्रह्मा है पिता सभी का, निर्मित यह जग सारा है।।1।।
दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है,
हम सेवक है मानवता के, सेवा धर्म हमारा है।
दीन-दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है ।।ध्रुव।।
सभी सुखी हों सभी निरोगी, सब को सुविधाएं एक मिले,
नीति नियम से बंधे सभी हो, पर स्वतंत्र प्रत्येक मिले,
अनिल-अनल भू-नल जल सब पर, सूची अधिकार हमारा है ।।2।।
दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है,
हम सेवक है मानवता के, सेवा धर्म हमारा है,
दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है ।।ध्रुव।।
सबको मिले जीविका जग, में भूखा सोए जीव नहीं,
सभी करें श्रम साहस संयम, अपनाए तरकीब यही,
सब समान हो सब महान हो, यह हमने स्वीकारा है ।।3।।
दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है,
हम सेवक है मानवता के, सेवा धर्म हमारा है,
दीन-दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है ।।ध्रुव0।।
शिक्षा की सुविधा हो सबको, सभी एक हो भेद न हो,
अपना-अपना कर्म करें सब, पछतावा या खेद न हो,
स्वस्थ सुखी सानंद रहें सब, यह अभियान हमारा है ।।4।।
दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है,
हम सेवक है मानवता के, सेवा धर्म हमारा है,
दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है ।।ध्रुव।।
अबला बाल वृध्द रोगी को, मिले सहारा हम सबका,
निर्बल निरीह और निर्धन को, हो न कहीं कोई खटका,
जो सेवा को धर्म मानता, वह ईश्वर का प्यारा है ।।5।।
दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है,
हम सेवक है मानवता के, सेवा धर्म हमारा है,
दीन दुखी की सेवा करना, निश्चित कर्म हमारा है ।।ध्रुव।।
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