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(silver tongued-G) सुभाषित संग्रह 61-70

  • सुभाषित क्रम ६१
मुक्तसड्गोनहंवादी घृत्युत्साहसमन्वत:।
सिद्धयसिद्धयोनिर्विकार: कीर्ति सात्विक उच्चते।।

अर्थ: जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और अशुद्ध में निर्विकार है, वह सात्विक कहा जाता है।

  • सुभाषित क्रम ६२

येन बध्दो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वाम् अभिबध्नामि रक्षे मा चल चल।।

अर्थ : जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बली को बांधा गया था, उसी सूत्र में तुम्हे बांधती हूँ, जो तुम्हारी रक्षा करेगा, रक्षा तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना

I am tying on your hand this Raksha (amulet), with which the most powerful and generous King Bali himself was bound. O Raksha don't go away don't go away.


  • सुभाषित क्रम ६३

 शुभाशुभ परीत्यागी भक्तिमान्य: स में प्रिय:।।

भावार्थ --- जो पुरुष न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ संपूर्ण कर्मों का त्यागी है वह भक्तियुक्त मनुष्य मुझे प्रिय है।


  • सुभाषित क्रम ६४
हीयते हि मतिस्तात! हीनै: सही समागमात् ।
समैश्च समतामेति विशिष्टैष्च विशिष्टताम् ।।

अर्थ :- नीचों से संपर्क करने से बुद्धि नीच बन जाती है। समान शील विद्या वाले व्यक्ति के संपर्क से बुद्धि उन्हीं के समान रहती है, किंतु अपने से विशिष्ट लोगों के संपर्क से बुद्धि विशिष्ट विलक्षण हो जाती है।


  • सुभाषित क्रम ६५

यो न ह्रष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काड़्क्षति।
शुभाशुभ परीत्यागी भक्तिमान्य: स में प्रिय:।।

भावार्थ --- जो पुरुष न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ संपूर्ण कर्मों का त्यागी है वह भक्तियुक्त मनुष्य मुझे प्रिय है।

 

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