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(silver tongued-G) सुभाषित संग्रह 61-70

  • सुभाषित क्रम ६१
मुक्तसड्गोनहंवादी घृत्युत्साहसमन्वत:।
सिद्धयसिद्धयोनिर्विकार: कीर्ति सात्विक उच्चते।।

अर्थ: जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और अशुद्ध में निर्विकार है, वह सात्विक कहा जाता है।

  • सुभाषित क्रम ६२

येन बध्दो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वाम् अभिबध्नामि रक्षे मा चल चल।।

अर्थ : जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बली को बांधा गया था, उसी सूत्र में तुम्हे बांधती हूँ, जो तुम्हारी रक्षा करेगा, रक्षा तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना

I am tying on your hand this Raksha (amulet), with which the most powerful and generous King Bali himself was bound. O Raksha don't go away don't go away.


  • सुभाषित क्रम ६३

 शुभाशुभ परीत्यागी भक्तिमान्य: स में प्रिय:।।

भावार्थ --- जो पुरुष न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ संपूर्ण कर्मों का त्यागी है वह भक्तियुक्त मनुष्य मुझे प्रिय है।


  • सुभाषित क्रम ६४
हीयते हि मतिस्तात! हीनै: सही समागमात् ।
समैश्च समतामेति विशिष्टैष्च विशिष्टताम् ।।

अर्थ :- नीचों से संपर्क करने से बुद्धि नीच बन जाती है। समान शील विद्या वाले व्यक्ति के संपर्क से बुद्धि उन्हीं के समान रहती है, किंतु अपने से विशिष्ट लोगों के संपर्क से बुद्धि विशिष्ट विलक्षण हो जाती है।


  • सुभाषित क्रम ६५

यो न ह्रष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काड़्क्षति।
शुभाशुभ परीत्यागी भक्तिमान्य: स में प्रिय:।।

भावार्थ --- जो पुरुष न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ संपूर्ण कर्मों का त्यागी है वह भक्तियुक्त मनुष्य मुझे प्रिय है।

 

अमृत वचन संग्रह 11-20 (divine wards-B)

  • अमृत वचन क्रम ११

अरे। असंभव को भी संभव ,

करके आज जग को दिखा देगें,

अगर कहो तो एक निमिष में ,
हम भूतल आकाश मिला दें।

        किन्तु नहीं विध्वंस विश्व का,

        हम अब भी निर्माण करेंगे,

        अरे।स्वयं विष पी करके भी 

         मानव का कल्याण करेंगे।

                     -- प०पू०गुरूजी


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  • अमृत वचन क्रम १२
कुत्ते को छूते हो, सर्प को दूध पिलाते हो, प्रतिदिन चूहे का खून चूसने वाली बिल्ली के साथ बैठकर एक थाली में खाते हो, तो फिर हे ! हिंदुओं अपने ही जैसे इन मनुष्यों को, जो तेरे ही राम और देवताओं के उपासक है, अपने ही देश बंधुओं को छूने से तुम्हें किस बात की शर्म आती है ।
                                                                   वीर सावरकर

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  • अमृत वचन क्रम १३
समर्थ गुरु रामदास जी ने कहा -  

"शक्ति से राज्य की उपलब्धि हो पाती है और युक्ति के द्वारा ही कार्य सिद्ध हो पाते हैं । जहां पर शक्ति एवं युक्ति दोनों विद्यमान हो वहां श्री का वास होता है।"

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  • अमृत वचन क्रम १४
हम लोगों को हमेशा सोचना चाहिए कि जिस कार्य को करने का हमने प्रण किया है और जो उद्देश्य हमारे सामने हैं, उसे प्राप्त करने के लिए हम कितना काम कर रहे हैं। जिस गति से तथा जिस प्रमाण में हम अपने कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं, क्या यह गति या प्रमाण, हमारी कार्य सिद्धि के लिए पर्याप्त है।


आद्य सरसंघचालक परम पूज्य डॉ0 केशवराव बलिरामराव हेडगेवार

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  • अमृत वचन क्रम १५
संगठन ही राष्ट्र की प्रमुख शक्ति होती है । संसार में कोई भी समस्या हल करनी हो तो वह शक्ति के आधार पर ही हो सकती है । शक्तिहीन राष्ट्र की कोई भी आकांक्षा कभी भी सफल नहीं होती । परंतु सामर्थ्यशाली राष्ट्र कोई भी काम, जब चाहे अपनी तब अपनी इच्छा अनुसार कर सकता है ।

-डॉक्टर हेडगेवार
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  • अमृत वचन क्रम १६
जीवन का पहला और स्पष्ट लक्ष्य है -- विस्तार । यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो तुम्हें फैलना ही होगा। जिस क्षण तुम जीवन का विस्तार बंद कर दोगे, उसी क्षण से जान लेना कि मृत्यु ने तुम्हें घर लिया है, विपत्तियां तुम्हारे सामने है।


 --स्वामी विवेकानंद

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  • अमृत वचन क्रम १७
व्यक्तिगत जीवन को समर्पित करते हुए, समष्टि जीवन को परिपुष्ट करने के प्रयास को ही यज्ञ कहा गया है। सद्गुण रूपी अग्नि में अयोग्य अनिष्ट और अहित बातों का होम करना ही यज्ञ है। श्रद्धामय, त्यागकर, सेवामय, तपस्यामय जीवन व्यतीत करना ही यज्ञ है। यज्ञ की अधिष्ठात्री देवता अग्नि है। अग्नि का प्रतीक है ज्वाला और ज्वालाओं का प्रतिरूप है -- हमारा परम पवित्र भगवा ध्वज

     प० पू० श्री गुरुजी

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  • अमृत वचन क्रम १८
परम पूजनीय श्री गुरुजी ने कहा, "पूजा का अर्थ है समर्पण की भावना को प्रकट करना। इसका दृश्य स्वरूप क्या होगा ? अपने लिए जो बहुत उपयोगी वस्तु हो उसे देना ही समर्पण का दृश्य स्वरूप होगा। व्यवहारिक जगत में हमारे स्वार्थों की पूर्ति के लिए धन की आवश्यकता रहती है। सुख समाधान, ऐश्वर्य, अन्यान्य प्रकार की उपयोग सामग्री, सब कुछ धन से प्राप्त होती है। धन को पर्याप्त प्रमाण में अपने आराध्य देव के सामने रखना ही सच्चा समर्पण है। यही वास्तव में पूजा है। यह द्रव्य समर्पण सारे जीवन समर्पण का प्रतीक और प्रारंभ मात्र है। हमने अधिक से अधिक दिया है, ऐसा संतोष हमको प्राप्त होता रहे, इतना हमे देना चाहिए।

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  •  अमृत वचन क्रम १९
सेवा हमारा कर्तव्य है, अनुकम्पा नहीं, धर्म पर चलने का अर्थ है बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय के उद्देश्य के लिए समर्पित होकर, कर्मशील होना ।



                                             स्वामी विवेकानन्द
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  •  अमृत वचन क्रम २०
समाज शक्ति को जगाने वाले हजारों, लाखों कार्यकर्ता चाहिए तब समाज शक्ति जगती है। ऐसे कार्यकर्ता समाज के भीतर चाहिए, जो निष्पृह हो, देशभक्त हो और अनुशासन में बंधे हुए हो। उनकी आंखों के सामने एक ही सपना हो कि भारत माता की प्रतिष्ठा विश्व में कैसे पढ़ें ।

                                     परम पूज्य रज्जू भैया

संघ किरण घर घर देने को अगणित नंदादीप जले (गणगीत शताब्दी वर्ष विशेष)

 


संघ किरण घर घर देने को अगणित नंदादीप जले

मौन तपस्वी साधक बन कर हिमगिरि सा चुपचाप गले ॥धृ॥

नई चेतना का स्वर दे कर जनमानस को नया मोड दे

साहस शौर्य हृदय मे भर कर नयी शक्ति का नया छोर दे

संघशक्ति के महा घोष से असुरो का संसार दले ॥१॥

परहित का आदर्श धार कर परपीडा को ह्रिदय हार दे

निश्चल निर्मल मन से सब को ममता का अक्षय दुलार दे

निशा निराशा के सागर मे बन आशा के कमल खिले ॥२॥

जन मन भावुक भाव भक्ति है परंपरा का मान यहा

भारत माँ के पदकमलो का गाते गौरव गान यहा

विश्व धर्म की स्वर वीणा पर गाते गौरव गान यहा 

सब के सुख दुख मे समरस हो संघ मन्त्र के भाव पले ॥३॥

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संघ यात्रा संगठन व सेवा के 100 वर्ष
























संघ यात्रा : संगठन व सेवा के 100 वर्ष
प्रस्तावना- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिये है। संघ की स्थापना पूजनीय डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी ने विक्रमी संवत 1982 की विजयदशमी (27 सितंबर, 1925) को नागपुर (महाराष्ट्र) में की थी। संघ स्थापना का उद्देश्य संपूर्ण हिंदू समाज को संगठित कर हिंदुत्व के अधिष्ठान पर अपने इस भारत राष्ट्र को समर्थ और परम वैभवशाली बनाना है। इस महत्वपूर्ण कार्य हेतु गुणवान एवं समर्पित कार्यकर्ता आवश्यक थे। ऐसे कार्यकर्ता निर्माण के लिए डॉ. हेडगेवार ने एक सरल किंतु अत्यंत परिमाण कारक दैनन्दिन 'शाखा' की पद्धति संघ में विकसित की। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संघ के स्वयंसेवक गत 100 वर्षों से वर्षों से समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय है और प्रयत्न कर रहे हैं। यह यात्रा एक रोचक कहानी है। संघ उपहास, विरोध के मार्ग को पार कर स्वीकृति एवं समर्थन की प्राप्ति की स्थिति में पहुंच गया है।

     आज संघ कार्य सर्वदूर, सभी क्षेत्रों में पहुंचा और प्रभावी बना है। देश भर में 51740 स्थान पर 83129 दैनिक शाखाएं तथा अन्य 26460 स्थानों पर 32147 साप्ताहिक मिलनों के माध्यम से संघ कार्य का देश व्यापी विस्तार हुआ है, जो लगातार बढ़ रहा है। स्वयंसेवक अपनी क्षमता के अनुसार सामाजिक समस्याओं व चुनौतियों के समाधान करने में स्वयं से लगे हुए हैं।आज संघ स्वयंसेवक समाज के सहयोग से स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कार और स्वावलंबन के विषयों पर ग्रामीण और नगरीय क्षेत्र में 1,29,000 सेवा कार्य व गतिविधियां चला रहे हैं। समाज परिवर्तन के इन प्रयासों में समाज का भरपूर सहयोग और समर्थन मिल रहा है। संघ के स्वयंसेवक अपने परिवार में संघ जीवन शैली को अपनाते हुए समाज अनुकूल परिवर्तन करने का प्रयास करते हैं। साथ ही व्यापक समाज परिवर्तन के लिए विभिन्न प्रकार के उपक्रम नियमित रूप से करते रहते हैं। 



शताब्दी वर्ष में पंच परिवर्तन- 

1. सामाजिक समरसता, 
2. पर्यावरण संरक्षण, 
3. कुटुंब प्रबोधन, 
4. स्व आधारित जीवन, 
5. नागरिक कर्तव्य बोध, 

     इन विषयों पर परिवर्तन हेतु जन जागरण के प्रयास चलेंगे। यह आज की परिस्थितियों में आवश्यक है। शताब्दी वर्ष के बाद भी यह उपक्रम निरंतर चलते रहेंगे। 

     जब हम वर्तमान परिदृश्य का विचार करते हैं तो भारत का भविष्य उज्जवल दिखाई देता है, लेकिन अनेक चुनौतियां भी सामने खड़ी है। उन चुनौतियों का समाधान भी समाज को संगठित होकर करना होगा। तभी भारत सामर्थ्यशाली बनेगा। संघ शताब्दी के इस वर्ष में स्वयंसेवक वर्षभर अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में संपर्क करेंगे। इस निमित्त विजयादशमी उत्सव, घर-घर संपर्क, हिंदू सम्मेलन, प्रमुख - जन गोष्ठियां, सामाजिक सद्भाव बैठकें तथा युवाओं के कार्यक्रम होने वाले हैं। इस पुस्तक में संघ की 100 वर्षों की यात्रा, वर्तमान परिदृश्य, चुनौतियां और भूमिका और पंच परिवर्तन के बारे में बताया गया है। समाज के चिंतन के लिए यह पुस्तक आपके हाथों में है। इस पुस्तक के विषय घर-घर व्यक्ति-व्यक्ति के अंत:करणों में पहुंचे और हमारे व्यवहार में आए, यही इसका उद्देश्य है। विश्वास है, हम इसमें सफल होंगे।

दत्तात्रेय होशबाले 
सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 

तिथि: विक्रम संवत् 2082, भाद्रपद शुक्ल एकादशी 
(तदनुसार 3 सितंबर 2025)

निश्चित होगा परिवर्तन (गणगीत शताब्दी वर्ष विशेष)





















 

श्रद्धामय विश्वास बढ़ाकर, सामाजिक सद्भाव जगाएं। 
अपने प्रेम परिश्रम के बल, भारत में नव सूर्य उगाएं ।।
जाग रहा है जन-गण-मन! निश्चित होगा परिवर्तन.........


शुद्ध सनातन परंपरामय, प्रेम भरा व्यवहार रहे। 
ऋषि मुनियों की शिक्षाओं पर चलने का संस्कार रहे।
राह रपटती इस दुनिया में, कुल कुटुंब का संरक्षण।।
निश्चित होगा परिवर्तन……

 सब समाज अंगान परस्पर, छुआछूत लवलेश ना हो।
 प्रीति प्रीति भर गहन सभी में, भेदभाव अवशेष ना हो।
 बने परस्पर पूरक पोषण, हृदयों में रसदार सृजन।।
 निश्चित होगा परिवर्तन…………

हरी भरी हो धरती अपनी, मिट्टी का भी हो पोषण। 
पंचतत्व की मंगल महिमा, दिव्य धरा के आभूषण।।
पुरखों के विज्ञान धर्म की, परंपरा का करें व्रत।।
निश्चित होगा परिवर्तन ……

स्वाभिमान भर, भाव स्वदेशी, स्वत्व बोध का ले आधार। 
परहित यान परस्पर पूरक, जन जीवन का शिष्टाचार।। 
विश्व मंच पर भारत मां के, यश की हो अनुगूॅज सघन।।........

निश्चित होगा परिवर्तन………............

संगठन व सेवा के 100 वर्ष
































आओ बनाएं समर्थ भारत 

     1925 की विजयदशमी विक्रम संवत 1982 को शुरू हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। संघ आज विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक संघगठन बन गया है, इसलिए स्वाभाविक ही संघ को जानने की उत्सुकता समाज में ब ढ़ी है। संघ को जानना है तो संघ के सस्थापक डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार जी को जानना आवश्यक है। वे जन्मजात देशभक्त थे। स्वाधीनता आंदोलन के सभी प्रयासों में वे सक्रिय थे। इसलिए दो बार (1921 व 1930) कारावास भी सहना पड़ा।
































संघ स्थापना 
     संघ की स्थापना ऐसे समय में हुई जब हमारा देश स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहा था। डॉ. हेडगेवार का स्पष्ट मत था कि राष्ट्र की स्वतंत्रता उनके पश्चात परम वैभव की प्राप्ति तथा समाज की विविध समस्याओं का समस्थाई स्थाई समाधान केवल हिंदू समाज के संगठित होने से होगा। उन्होंने जाति ,भाषा, वेश-भूषा, प्रान्त आदि विविधताओं को ही भेद मानकर संगठित हुए हिंदू समाज को हिंदुत्व के आधार पर संगठित करने का विचार कर संघ की स्थापना की।  अपने यहां हिंदुत्व कोई उपासना पद्धति या Religion नहीं है, यह जीवन दृष्टि है और उस दृष्टि के आधार पर विकसित हुई जीवन पद्धति है। इस भगीरथ और महत्वपूर्ण कार्य हेतु वैसे ही गुणवान कार्यकर्ता आवश्यक थे। ऐसे कार्यकर्ता निर्माण करने के लिए डॉक्टर हेडगेवार ने एक सरल किंतु अत्यंत परिणामकारक दैनन्दिन 'शाखा' की पद्धति संघ में विकसित की।
































व्यक्तित्व निर्माण की कार्यपद्धति 
     संघ कार्य के प्रथम चरण में संगठन खड़ा करना ही प्रमुख कार्य था, और उस हेतु व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया को गतिमान करना आवश्यक था। व्यक्ति निर्माण हेतु चलने वाली नित्य शाखा में स्वयंसेवक अत्यंत सामान्य दिखने वाले कार्यक्रम - खेल, व्यायाम, योगासन, गीत, कहानी, प्रार्थना आदि करते हैं, जो शाखा के बाहर भी समाज में किए जाते हैं। यही कार्यक्रम स्वयंसेवकों में साहस, धैर्य, शक्ति, राष्ट्रीय चरित्र्य, अनुशासन, देशभक्ति, सेवा आदि गुना का निर्माण करते हैं। इन कार्यक्रमों की निरंतरता ही स्वयंसेवकों के संपूर्ण जीवन की दिशा और प्राथमिकताएं बदल देती है। तभी तो संघ सामान्य लोगों का असामान्य संगठन बना हुआ है। इसी कार्य पद्धति के कारण जो स्वयंसेवक निर्माण हुए, उनके आचरण के कारण संघ की समाज जीवन में सकारात्मक छवि बनी हुई है। संघ यानी देशभक्ति, नि: स्वार्थ सेवा, अनुशासन, यह परिचय समाज के मन में स्थापित हुआ है।
































संघ कार्य का विस्तार 
     किसी भी श्रेष्ठ कार्य को उपहास, उपेक्षा,विरोध और फिर स्वीकार्यता के चरणों से गुजरना पड़ता है, वैसे ही संघ को भी इन सभी चरणों से गुजरना पड़ा। किंतु श्रेष्ठ अधिष्ठान, उत्तम कार्यपद्धति और स्वयंसेवकों के निस्वार्थ देशभक्ति से भरे, समरसता युक्त आचरण के कारण संघ समाज का विश्वास जीतने में सफल हुआ है। आज संघ का कार्य कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से अरुणाचल प्रदेश तक भारत के हर कोने है तक पहुंच गया है। आज संपूर्ण भारत के कुल 924 जिलों में से 98.3 प्रतिशत जिलों में संघ की शाखाएं चल रही है। कुल 6618 खण्डों में से 92.3 प्रतिशत खण्डों (तालुका) में, कुल 58393 मंडलों मंडल ( मंडल यानी 10 - 12 ग्रामों का एक समूह) में से 52.2 प्रतिशत मंडलों में 51740 स्थानों पर 83129 दैनिक शाखाएं तथा अन्य 26460 स्थानों पर 32147 साप्ताहिक मिलनों के माध्यम से संघ कार्य का देशव्यापी विस्तार हुआ है, जो लगातार बढ़ रहा है। इन 83129 दैनिक शाखाओं में से 59 प्रतिशत शाखाएं छात्रों की है तथा शेष 41 प्रतिशत व्यवसाय स्वयंसेवकों की शाखाएं हैं।

































सेवा कार्य 
     देशभक्ति से ओत-प्रोत स्वयंसेवक समाज के कष्ट देखते ही दौड़ पढ़ते हैं, तभी आज किसी भी प्राकृतिक अथवा अन्य आपदाओं के समय वहां तुरंत पहुंचते हैं। केवल आपदा के समय ही नहीं, तो नियमित रूप से समाज में दिखने वाले अभाव, पीड़ा, अपेक्षा दूर करने हेतु स्वयंसेवक अपनी क्षमतानुसार सर्वत्र प्रयास करते हैं। आज संघ के स्वयंसेवक समाज की सहयोग से स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कार और स्वावलंबन के विषयों पर ग्रामीण और नगरीय क्षेत्र में 129000 सेवा कार्य व गतिविधियां चला रहे हैं। इसके अतिरिक्त स्वयंसेवक प्रशासन अथवा सरकार पर निर्भर न रहते हुए अपने ग्राम का सर्वांगीण विकास सभी ग्रामवासी मिलकर करें, इस उद्देश्य से 'ग्राम विकास' का कार्य भी कर रहे हैं। अच्छी नस्ल की गायों का संरक्षण, संवर्धन, नस्ल सुधार करते हुए गोबर आधारित जैविक खेती के लिए किसानों को प्रशिक्षण, प्रबोधन एवं प्रोत्साहन देने की दृष्टि से गौसेवा - गौसंवर्धन का कार्य भी करते हैं।








































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स्वर्ग और नरक















एक बुजुर्ग औरत मर गई, यमराज लेने आये।

औरत ने यमराज से पूछा, आप मुझे स्वर्ग ले जायेगें या नरक।

यमराज बोले दोनों में से कहीं नहीं।

तुमनें इस जन्म में बहुत ही अच्छे कर्म किये हैं, इसलिये मैं तुम्हें सिधे प्रभु के धाम ले जा रहा हूं।

बुजुर्ग औरत खुश हो गई, बोली धन्यवाद, पर मेरी आपसे एक विनती है।

मैनें यहां धरती पर सबसे बहुत स्वर्ग - नरक के बारे में सुना है मैं एक बार इन दोनों जगहो को देखना चाहती हूं।

यमराज बोले तुम्हारे कर्म अच्छे हैं, इसलिये मैं तुम्हारी ये इच्छा पूरी करता हूं।चलो हम स्वर्ग और नरक के रास्ते से होते हुए प्रभु के धाम चलेगें।

दोनों चल पडें, सबसे पहले नरक आया।

नरक में बुजुर्ग औरत ने जो़र जो़र से लोगो के रोने कि आवाज़ सुनी।

वहां नरक में सभी लोग दुबले पतले और बीमार दिखाई दे रहे थे।

औरत ने एक आदमी से पूछा यहां आप सब लोगों कि ऐसी हालत क्यों है।

आदमी बोला तो और कैसी हालत होगी, मरने के बाद जब से यहां आये हैं, हमने एक दिन भी खाना नहीं खाया।

भूख से हमारी आत्मायें तड़प रही हैं

बुजुर्ग औरत कि नज़र एक विशाल पतीले पर पडी़, जो कि लोगों के कद से करीब 300 फूट ऊंचा होगा, उस पतीले के ऊपर एक विशाल चम्मच लटका हुआ था।

उस पतीले में से बहुत ही शानदार खुशबु आ रही थी।

बुजुर्ग औरत ने उस आदमी से पूछा इस पतीले में क्या है।

आदमी मायूस होकर बोला ये पतीला बहुत ही स्वादिष्ट खीर से हर समय भरा रहता है।

बुजुर्ग औरत ने हैरानी से पूछा, इसमें खीर है,तो आप लोग पेट भरके ये खीर खाते क्यों नहीं, भूख से क्यों तड़प रहें हैं।

आदमी रो रो कर बोलने लगा, कैसे खायें,ये पतीला 300 फीट ऊंचा है हममें से कोई भी उस पतीले तक नहीं पहुँच पाता।

बुजुर्ग औरत को उन पर तरस आ गया।

सोचने लगी बेचारे, खीर का पतीला होते हुए भी भूख से बेहाल हैं।

शायद ईश्वर नें इन्हें ये ही दंड दिया होगा,

यमराज बुजुर्ग औरत से बोले चलो हमें देर हो रही है।

दोनों चल पडे़, कुछ दूर चलने पर स्वर्ग आया।

वहां पर बुजुर्ग औरत को सबकी हंसने,खिलखिलाने कि आवाज़ सुनाई दी।

सब लोग बहुत खुश दिखाई दे रहे थे।

उनको खुश देखकर बुजुर्ग औरत भी बहुत खुश हो गई।

पर वहां स्वर्ग में भी बुजुर्ग औरत कि नज़र वैसे ही 300 फूट ऊंचे पतीले पर पडी़ जैसा नरक में था, उसके ऊपर भी वैसा ही चम्मच लटका हुआ था।

बुजुर्ग औरत ने वहां लोगो से पूछा इस पतीले में क्या है।

स्वर्ग के लोग बोले के इसमें बहुत टेस्टी खीर है।बुजुर्ग औरत हैरान हो गई,उनसे बोली पर ये पतीला तो 300 फीट ऊंचा है।

आप लोग तो इस तक पहुँच ही नहीं पाते होगें,उस हिसाब से तो आप लोगों को खाना मिलता ही नहीं होगा, आप लोग भूख से बेहाल होगें।

पर मुझे तो आप सभी इतने खुश लग रहे हो, ऐसे कैसे,

लोग बोले हम तो सभी लोग इस पतीले में से पेट भर के खीर खाते हैं,औरत बोली पर कैसे,पतीला तो बहुत ऊंचा है।

लोग बोले तो क्या हो गया पतीला ऊंचा है तो ,यहां पर कितने सारे पेड़ हैं, ईश्वर ने ये पेड़ पौधे, नदी, झरने हम मनुष्यों के उपयोग के लिये तो बनाईं हैं।

हमनें इन पेडो़ कि लकडी़ ली, उसको काटा, फिर लकडियों के टूकडो़ को जोड़ के विशाल सीढी़ का निर्माण किया।

उस लकडी़ की सीढी़ के सहारे हम पतीले तक पहुंचते हैं और सब मिलकर खीर का आंनद लेते हैं,बुजुर्ग औरत यमराज कि तरफ देखने लगी ।

यमराज मुसकाये बोले:-ईश्वर ने स्वर्ग और नरक मनुष्यों के हाथों में ही सौंप रखा है,चाहें तो अपने लिये नरक बना लें, चाहे तो अपने लिये स्वरग, ईश्वर ने सबको एक समान हालातो में डाला हैं।

उसके लिए उसके सभी बच्चें एक समान हैं, वो किसी से भेदभाव नहीं करता।

वहां नरक में भी पेेड़ पौधे सब थे, पर वो लोग खुद ही आलसी हैं, उन्हें खीर हाथ में चाहिये,वो कोई कर्म नहीं करना चाहते, कोई मेहनत नहीं करना चाहते, इसलिये भूख से बेहाल हैं।

क्योंकि ये ही तो ईश्वर कि बनाई इस दुनिया का नियम है, जो कर्म करेगा, मेहनत करेगा, उसी को मीठा फल खाने को मिलेगा।स्वर्ग और नरक आपके हाथ में है,मेहनत करें, अच्छे कर्म करें और अपने जीवन को स्वर्ग बनायें ।