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विजय का यह पर्व आया




विजय का यह पर्व आया विजय का वरदान बनकर॥
शांन्त जन-मन-शिन्धु में
उत्साह की लहरें उठाता
युग-युगों की सुप्त स्मृतियाँ
क्षुब्ध मानस में जगाता
पुण्य मातृस्तवन गूँजा फिर विजय का गान बनकर॥
चतुर्दिक निज प्रखरता से
छात्र बल का तेज जागा
धमनियों में तीव्रता से
उष्ण शोणित वेग जागा
देश का तारुण्य जागा शक्ति का सम्मान बनकर॥
पाप-प्रेरित पतित पशु बल
हो उठा अस्थिर विकम्पित
भीत-मानव त्यक्त भय हो
मातृपद में हुआ विनमित
देव-भू की शक्ति जागी चण्डिका सप्राण बन कर॥
विश्व ने निज नेत्र खोले-
और पाया एक साधक
मोदमय मंगल महापथ-
में रहा कोई न बाधक
शक्ति अभिमन्त्रित हुई फिर जगद्गुरु का मान बनकर॥
विजय का वरदान बनकर॥

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