समाज के आराध्य हमारा, सेवा है आराधना।
भारत माता के वैभव की, सेवाव्रत से साधना ||ध्रु||
हम सब भारतमाता की सुत, आपस में भाई-भाई।
भ्रम-अज्ञान, स्वार्थ के कारण, भेदभाव की यह खाई।
सेवाव्रत से आज हमें है, इस खाई को पाटना।
समाज के आराध्य हमारा, सेवा है आराधना ||१||
समाज से ही संस्कृति की, यह श्रेष्ठ धरोहर हमें मिली।
धन, सामर्थ्य, ज्ञान की पूंजी, समाज से ही हमें मिली।
यह समाज-ऋण पूर्ण चुकाने, जो पाया से बांटना।
समाज के आराध्य हमारा, सेवा है आराधना ||२||
समान अवसर मिले सभी को, कोई भी न उपेक्षित हो।
सभी स्वस्थ, शिक्षित, संस्कारित, समर्थ और सुरक्षित हो।
दया नहीं, उपकार नहीं यह, अपनेपन की भावना।।
समाज के आराध्य हमारा, सेवा है आराधना ||३||
भाषा, पंथ, जाति जो भी हो, अपने तो है बंधु सभी।
ग्राम-नगर-वनवासी, गिरिजन भारत माॅ के पुत्र सभी।
पुत्रों के सुख में ही तो है, मां के सुख की धारणा।
समाज के आराध्य हमारा, सेवा है आराधना।
भारत माता के वैभव की, सेवाव्रत से साधना।
समाज के आराध्य हमारा, सेवा है आराधना ||४||

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