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संघ का कार्य

संघ का कार्य
●संघ में व्यक्ति निष्ठा नहीं बल्कि तत्व निष्ठा है।
●संघ में सामाजिक चिंतन होता है और व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता है।
●सभी स्वयंसेवकों का नियमित, निश्चित समय पर, निश्चित अवधि हेतु, निश्चित स्थान पर एकत्रित आना। यहीं संघ की शाखा पद्धति है।
●संघ में समूह संपर्क के स्थान पर वैयक्तिक सम्पर्क को वरीयता।
●संघ की कार्य पद्धति आंदोलनात्मक नहीं, वरन संगठनात्मक है। हिंदू समाज को संगठित करने में सहायक प्रश्नों पर आंदोलन अन्यथा नहीं।
●संघ की कार्यपद्धति रचनात्मक है, प्रचारात्मक नही है। मनुष्य निर्माण का कार्य रचनात्मक, गणवेश पहन मेले, तमाशे आदि में व्यवस्था करना अथवा श्रमदान करते हुए छायाचित्र खिंचवाना प्रचारात्मक है। नि:स्वार्थी एवं यश-मान की इच्छा से मुक्त व्यक्ति ही समाज के बंधुओं की सही अर्थ में सेवा करने में समर्थ होते हैं।
●संघ कार्य, मान, सम्मान, प्रतिष्ठा एवं यश अर्जन की इच्छा से करने वाला नहीं अपितु वृक्ष के बढ़ने की तरह एक मौन क्रिया है।
●सामूहिक निर्णय को निष्ठा से क्रियान्वित करना।

●संघ की पद्धति में कार्य के अनुसार योग्य व्यक्ति की खोज अथवा ऐसे व्यक्तियों का निर्माण। प्रत्येक के लिए योग्य कार्य की व्यवस्था।

●संघ की कार्य पद्धति में अपने सहयोगी के गुण देखने की प्रेरणा है उसके दोष-दर्शन की पद्धति नहीं है।

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